चार सौ साल पुरानी वीरान पढी मस्ज़िद फिर से हुयी आबाद, खूबसूरती में लगे चार चाँद

चार सौ साल की विरासत समेटे मुरादाबाद में जहां रूस्तम का किला सरीखी कई धरोहर खंडहर में बदल चुकी हैं, वहीं एक बार की वीरानी के बाद जामा मस्जिद की चमक में चार चांद लगे हैं। इसके बुलंद मीनारों को देखकर आज लोग फख्र महसूस करते हैं।

मुरादाबाद में रामगंगा किनारे रूस्मत खां ने 1625 में किला बनवाया था तो दरवाजे के सामने 1631 में एक इबादतगाह की नींव भी रखी थी। ऊपर गुंबद बनी थी तो दरवाजा रामगंगा नदी की जानिब खुलता था। जहां फौजी अफसरों के साथ मुकामी लोग इबादत करते थे।
बुजुर्ग बताते हैं पहले रामगंगा नदी बहुत दूर बहती थी, जबकि करूला नदी पास पड़ती थी। इसके निर्माण को पानी करूला नदी से लिया गया था। रूस्तम की वापसी के बाद यह इबादतगाह भी वीरान हो गई। पुरानी इमारत और दरवाजे पर लगा शिलापट्ट मौजूद रहा।
पुराने दस्तावेजों के आधार पर शहर इमाम सैयद मासूम अली आजाद कहते हैं कि कोई इबादत करने वाला था और न ही कोई देखभाल करने वाला तो सहन में घास उग आई। अंग्रेजी हुकूमत में ताला लगाकर बंद कर दिया गया। दिल्ली में दीनी तालीम से फारिग होकर 1850 में नगीना निवासी मौलाना सैयद अली मोहद्दिस मुरादाबाद आए।
उन्होंने इस इबादतगाह का ताला खोलकर नमाज अदा कराई। लोगों को नमाज के लिए रूजू किया। अंग्रेजों ने मुकदमा चलाया। उनको फांसी की सजा सुना दी गई। इसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के संस्थापक सर सैयद अहमद खां मुंसिफ बनकर मुरादाबाद में तैनात हुए।
मुकामी लोगों ने मौलाना की हमदर्दी में सर सैयद अहमद खां की अदालत में पैरवी की। सर सैयद ने मौलाना की सजा खत्म कर दी। वक्त गुजरने के साथ नमाजी बढ़े तो जामा मस्जिद का दर्जा मिला। मौलाना सैयद आलम अली मोहद्दिस की वफात के बाद साहबजादे मौलाना कासिम अली ने इमामत की। तभी से उनके वारिसों की इमामत का सिलसिला चला आ रहा है। अब तक इंतकाल फरमा चुके सभी आठों इमाम मस्जिद के सहन में दफन हैं।
पहले जामा मस्जिद की देखभाल की जिम्मेदारी शहर इमाम के हाथों में होती थी। 1960 में वक्फ बोर्ड बनने के बाद जामा मस्जिद वक्फ कमेटी बनी।
अलविदा जुमा पर जामा मस्जिद में करीब दस हजार नमाजी समा जाते हैं। कमेटी के अंडर में 1998 में करीब अस्सी लाख की लागत से हमसफर शादी हाल बना तो मस्जिद की सीढ़ियां उतरते ही जामा मस्जिद पार्क बनवाया गया।