भारत में चल रहे ट्रिपल तलाक़ के मामले में आख़िर क्या कहते हैं?

तलाक मांगने के अधिकार पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती है, लेकिन महिलाओं को इसका अधिकार देना अपने आप में बेमतलब की बात होगी और शायद इससे कुछ अच्छा होने की जगह ज़्यादा बुरा ही होगा.”
एक विश्लेषक ने मई 1949 में एक लेख में भारत में महिलाओं के बदलती स्थिति और तलाक़ के मुद्दे पर लिखा था.

उन्होंने लेख में आगे कहा, “कई बार वो माता पिता के घर से ज़्यादा खुश ससुराल में रहती थीं. उनकी परेशानियां और दर्द उनके परिवार में सुलझा लिया जाता है. हो सकता है कि परिवार से उनका सामंजस्य कभी कभार बहुत बुरा रहता हो, लेकिन इन सबके बाद भी परिवार बना रहता है.”वो कहती हैं कि बहुत बड़ी आबादी के बीच तलाक़ की कोई चर्चा भी नहीं होती थी.

उनके मुताबिक़ भारत की अर्थव्यवस्था मूल रूप से ग्रामीण है, बड़ी संख्या में लोग अशिक्षित हैं, उनका बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं है और लोगों के बीच बेहतर जीवन जीने की दुहाई मौजूद नहीं है रोमा मेहता ने लिखा कि “प्यार और नफ़रत, विवाह और दूसरी शादी जैसी समस्या को सामाजिक स्तर पर सुलझा लिया जाता है.”लेकिन वो सब बीते दिनों की बात हो गई.

समय के साथ ही शहरों में परंपरागत संयुक्त परिवार टूटता गया. महिलाएं काम पर जाने लगीं या उन्होंने अपना ख़ुद का काम शुरू कर दिया. महिलाएं आर्थिक सुरक्षा के लिए पति पर निर्भर न रहीं, पति घर के काम में हाथ बंटाने लगे हैं और लिंग भेद से जुड़े मामलों में बदलाव आ रहा.है

ऐसा हो सकता है कि कुछ महिलाएं तलाक़ से जुड़े सामाजिक सोच – जहां इसे धब्बे की तरह देखा जाता है, पति से अलग होने या तलाक़ की बात की जानकारी न दें. लेकिन अध्ययन से कुछ बातें सामने आती हैं:
भारत में तलाक़ और अलग रहने के मामले में शहरों और गांवों में बहुत कम अंतर है.

शोधकर्ताओं का कहना है, “यह आंकड़ा बहुत हैरान करता है. लोगों का किसी वर्ग से ताल्लुक़ रखने या न रखने का शायद ऐसे मामलों पर असर होता हो लेकिन आप शहरी हैं या ग्रामीण इसका कोई ख़ास असर नहीं दिखता है