मिलिए इनसे ये हैं फ़ैज़ाबाद की डीएम किंजल सिंह, और उनके परिवार की दर्दनाक कहानी

फ़ैज़ाबाद की डीएम किंजल सिंह और उनके परिवार की कहानी बहुत ही दर्दनाक है और प्रेरणादायक भी, यह कहानी सुनकर आपकी आँखों में आंसू ज़रूर आएंगे और आप एक पत्नी और एक बेटी के संघर्ष की सीमाओं से दो चार हो जाएंगे.

“मुझे मत मारो, मेरी दो बेटियां हैं!” किंजल के पिता के आखरी शब्द थे

किंजल सिंह 2008 में आई.ए.एस में चयनित हुई थीं, आज उनकी पहचान एक ईमानदार और कर्मठ अफ़सर के रूप में होती है। उनके काम करने के तरीके से जिले में अपराध करने वालों के पसीने छूटते हैं पर किंजल के लिए इस मुकाम को हासिल करना आसान नहीं था, उन्होंने कई बाधाओं को पार करके यह मुकाम हासिल किया है।

किंजल सिंह मात्र 6 महीने की थीं जब उनके पिता, जो एक पुलिस अफसर थे, उनकी हत्या पुलिस वालों ने ही कर दी थी। बचपन जहाँ बच्चों के लिए खेलने-कूदने के दिन होते हैं, वहीं इतनी छोटी उम्र में ही किंजल अपनी माँ के साथ पिता के क़ातिलों को सज़ा दिलाने के लिए कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने लगीं। हालाँकि उस नन्हीं बच्ची को अंदाज़ा नही था कि आख़िर वो वहाँ क्यों आती है, लेकिन वक़्त ने धीरे-धीरे उन्हें यह एहसास करा दिया कि उनके सिर से पिता का साया उठ चुका है।

“मुझे मत मारो, मेरी दो बेटियां हैं!” किंजल के पिता के आखरी शब्द थे।

मौत को सामने देखकर भी जिस पिता को उसकी बेटियों की याद थी, उसकी बेटियों ने भी पिता के सर को झुकने नहीं दिया। उस समय किंजल छोटी थीं और उनकी छोटी बहन प्रांजल गर्भ में थी। अगर आज उनके पिता ज़िंदा होते तो उन्हे ज़रूर गर्व होता कि उनके घर बेटियों ने नहीं वीरांगनाओं ने जन्म लिया है, जो आज बाकी महिलाओं के लिए एक मिसाल हैं।

किंजल ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बनारस से पूरी की और माँ के सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने दिल्ली का रुख किया और दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। वो पढ़ने में बहुत तेज़ और साहसी भी थीं, तभी तो एक छोटे से जनपद से दिल्ली जैसे बड़े शहर में आकर भी उन्होंने पूरी दिल्ली यूनिवर्सिटी में टॉप किया और वो भी एक बार नहीं बल्कि दो बार।

किंजल की पढाई के बीच में ही उनकी माँ को कैंसर हो गया था, इस बीमारी की वजह से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। पिता को खोने के बाद, माँ को खोने के डर ने किंजल का जीवन अस्त व्यस्त कर दिया। एक तरफ सुबह माँ की देख-रेख उधर दूसरी तरफ कॉलेज का भार, लेकिन किंजल कभी टूटी नहीं, ऊपर वाला भी किंजल का इम्तिहान लेने में पीछे नहीं रहा, परीक्षा से कुछ दिन पहले ही उनकी माँ का देहांत हो गया।

सर से माँ और बाप दोनों का साया उठ जाने के बाद भी उनकी हिम्मत तो देखिये। दिन में माँ का अंतिम संस्कार करके, रात में पढाई की और सुबह परीक्षा देने कॉलेज पहुँच गईं, ऐसा करना आम इंसानों के लिए नामुमकिन सी बात है। परिणाम आए पर उसकी ख़ुशी बांटने के लिए किंजल के पास माँ-बाप नहीं थे, उन्होंने यूनिवर्सिटी टॉप किया था और स्वर्ण पदक भी जीता था।

किंजल बताती हैं कि कॉलेज में जब त्योहारों के समय सारा हॉस्टल खाली हो जाता था तो वो और उनकी बहन एक दूसरे की शक्ति बनकर एक साथ पढाई करती थीं। जब घर पर माँ-बाप ही नहीं तो छुट्टियां मनाने इंसान किसके लिए जाएगा। आईएस के लिए वो निरन्तर प्रयत्नशील रहीं और वर्ष 2008 में जब परिणाम घोषित हुआ तो संघर्ष की जीत हुई और दो सगी बहनों ने आइएएस की परीक्षा अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण कर अपनी माँ का सपना साकार किया।

किंजल जहाँ आईएएस की मेरिट सूची में 25 वें स्थान पर रही तो प्रांजल ने 252वें रैंक लाकर यह उपलब्धि हासिल की पर अफ़सोस उस वक़्त उनके पास खुशियाँ बांटने के लिए कोई नही था। किंजल कहती हैं, “बहुत से ऐसे लम्हे आए जिन्हें हम अपने पिता के साथ बांटना चाहते थे। जब हम दोनों बहनों का एक साथ आईएएस में चयन हुआ तो उस खुशी को बांटने के लिए ना तो हमारे पिता थे और न ही हमारी माँ।”

किंजल अपने माता-पिता को अपनी प्रेरणा बताती हैं, आज देश में बहुत सी महिला आई.ए.एस हैं, लेकिन सबकी कहानी किंजल सिंह जैसी नहीं है। उनमें बचपन से ही हर परिस्थितियों से लड़ने की ताक़त थी। किंजल ना सिर्फ आईएएस बनीं बल्कि 31 साल बाद आख़िर किंजल अपने पिता को इंसाफ़ दिलाने में भी सफल हुईं, उनके पिता के हत्यारे आज सलाखों के पीछे हैं।