डॉ. मनमोहन सिंह को इतिहास याद कर रहा है -सुधीर सिंह परिहार

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। व्हाईट हाउस के चीफ फोटोग्राफर पेट सोयूज ने विहाइंड द लेंस : ऑफिसियल बिजिट्स थ्रू द ईयर्स शीर्षक से मंगलवार 18 अक्टूबर को एक फोटो गैलरी जारी की है।

विपक्ष ही नहीं, देश की मीडिया, जनता और स्वयं कांग्रेस मूल्यांकन से चूके

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इसमें ओबामा प्रशासन के दौरान अमेरिका के मेहमान बने महत्वपूर्ण विदेशी मेहमानों के आगमन और स्वागत की औपचारिक तथा पर्दे के पीछे की कुछ घटनाओं के फोटोग्राफ्स का सिलेक्शन किया गया है। हालांकि अन्य विषयों से संबंधित सिलेक्शन भी किए गए हैं जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा की गई अन्य देशों की यात्राओं के फोटोग्राफ्स की एक अलग सीरिज रखी गई है, जिसमें ओबामा और मिशेल एक भारतीय स्कूल के बच्चों के साथ डांस कर रहे हैं। 18 अक्टूबर को जारी राज्य के मेहमानों के संग्रह में सबसे पहले 24 नवंबर, 2009 में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी पत्नी श्रीमति गुरूशरण कौर का स्वागत करते हुए अमेरिका की प्रथम महिला मिशेल और राष्ट्रपति ओबामा मनमोहन सिंह की आगवनी करते दिख रहे हैं।

सामान्य तौर पर यह एक सामान्य फोटो ही है और इसका कोई विशिष्ट कूटनीतिक महत्व भी निर्धारित नहीं किया जा सकता, फिर भी इस फोटो को देखकर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा विपक्ष के अनर्गल आरोपों के मद्देनजर अपने कार्यकाल की समाप्ति पर जो वाक्य कहा था कि – ”इतिहास मेरे कार्यों को याद करेगाÓÓ याद हो आया। अभी दो दिन पहले ही संसदीय पैनल को विदेश सचिव एस. जयशंकर ने बताया कि इससे पहले भी भारतीय सेना ने एलओसी के पार सर्जिकल स्ट्राइक की है। उन्होंने लॉचिंग पेड नष्ट करने जैसी कार्यवाही को पहली बार की गई कार्यवाही तो बताया, लेकिन यह भी स्वीकार किया कि सेना कई बार एलओसी के पार कार्यवाही करती रही है।

इसका सीधा सा एक मतलब और निकला कि ऐसा पहली बार हुआ है कि एलओसी पर सर्जिकल स्ट्राइक करने के बाद उसकी सार्वजनिक घोषणा की गई और राजनीतिक फायदे के लिए सरकार और सेना के सम्मिलित निर्णय तथा कार्यवाही को उपयोग किया जा रहा है। यहां 2010 से लेकर 2014 तक उन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अब देश मन-ही-मन याद करके उनकी वाह-वाह कर रहा है.

कि बजाए राजनीतिक लाभ उठाने के उस प्रधानमंत्री ने देश की कूटनीति और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को ध्यान में रखकर देश हित में स्वयं और अपनी पार्टी कांग्रेस को राजनीतिक घाटा सहन करने का निर्णय लिया। देश के सिपाही के सिर के बदले पाकिस्तानियों के सिर लाकर भी यदि प्रधानमंत्री रहे डॉ. मनमोहन सिंह मीडिया और वोट के लालच से बचे रहे तो निश्चित ही देश को उनकी राष्ट्रीय भावना और बुद्धिमत्ता का आदर करना ही होगा।

2008 में जब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत एक अलग-थलग खड़ा देश माना जाता था तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बड़ी हिम्मत के साथ अपनी सरकार को दांव पर लगाते हुए अमरीका के साथ शांतिपूर्ण परमाणु शक्ति उपयोग के लिए समझौता भी किया और बिना एनपीटी पर हस्ताक्षर किए ही भारत को परमाणु शक्ति क्षमता वाले देश के रूप में मान्यता भी दिला दी। देश आज याद कर रहा है उस विपक्ष को जो संसद में नोटों की गड्डियां लहराकर इस सरकार को बदनाम करके देश हित की न जाने कौन सी परंपरा का पालन कर रहे थे?

2008 में ही भयानक सूखा पड़ा था उसी दौरान अमेरिका के ‘सबप्राइम संकटÓ में विश्वव्यापी मंदी की स्थिति खड़ी कर दी थी, लेकिन देश आज मनमोहन सिंह को उनके साहसी निर्णय के लिए मन-ही-मन धन्यवाद कर रहा है। 2006 में मनमोहन सिंह सरकार ने आदिवासियों के हित में जो वनवासी अधिकार अधिनियम पारित किया था वह आज इस पिछड़े नागरिकों के समूह के लिए कारण है मनमोहन सिंह को एक दूरदर्शी प्रधानमंत्री के रूप में याद करने के लिए।

डॉ. मनमोहन सिंह और राहुल गांधी की ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी से लड़ाई के लिए प्रस्तुत योजनाएं मनरेगा हो या पूरे भारत के लोगों को अद्वितीय पहचान उपलब्ध कराने वाली ‘आधार परियोजनाÓ हो या फिर मंगल ग्रह पर और चंद्रमा पर कामयाबी की नींव रखने वाले कार्यक्रमों की शुरूआत हो या फिर देश की संसद और ताज होटल पर अपनी नापाक नजर डालने वाले आतंकवादी अफजल गुरू और कसाब को फांसी तक पहुंचाने की बात हो, डॉ. मनमोहन सिंह ने वास्तव में सिक्ख धर्म से जुड़ी बहादुरी, साहस, ईमानदारी और देशभक्ति की कायम मिसाल परंपरा को ही न सिर्फ आगे बढ़ाया, बल्कि उसमें इतिहास में झांकने वालों को अपनी याद एक मजबूत इरादे वाले राष्ट्रभक्त सरदार की छवि में भी प्रस्तुत किया है। एक बड़ी ही महत्वपूर्ण विशेषता जो वर्तमान राजनीति में तो कैसे भी नहीं मिलती कि कुर्सी पर बैठकर भी किसी के विश्वास को न तोडऩे की ईमानदारी।

डॉ. मनमोहन सिंह न तो राजनीतिक व्यक्ति थे और न ही चुनाव जीतकर सांसदों द्वारा नेता के रूप में चुने गए थे, उन्हें तो कुछेक लोगों की संकुचित सोच से सोनिया गांधी के व्यथित होने की घटना ने एक वैकल्पिक नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया था। जो चुनाव लड़कर यूपीए बना था उसकी नेता सोनिया गांधी थीं और उनके निवेदन पर उन्होंने प्रधानमंत्री पद स्वीकार किया था। विपक्ष ने कई तरह के आरोप लगाए और यहां तक कहा कि प्रधानमंत्री दस जनपथ से पूछकर कार्य करते हैं। जिस दल को बहुमत मिला था.

उसके संसदीय नीति के अनुरूप बने अध्यक्ष से पूछकर कार्य करने में गलत भी कुछ नहीं था। आज जब प्रधानमंत्री को बिना किसी संसदीय मान्यता वाले लोगों से सहमति-असहमति के प्रश्रों पर मीडिया की चर्चाओं में खड़ा पाते हैं तो सहज ही इतिहास से डॉ. मनमोहन सिंह मुस्कुराते हुए झांकते नजर आते हैं।

भारत की चुनावी परंपराओं में बिना पैसा खर्च किए चुनाव लडऩा असंभव है और राजनीतिक दल कैसे चंदा लेकर उसका इंतजाम करते हैं यह न तो न्यायालय से और न ही चुनाव आयोग से और न ही मीडिया व जनता से छिपा है। बाबा रामदेव और अन्ना हजारे इस चुनावी खर्च को भी समझते हैं और कालेधन की महिमा को भी वर्तमान सरकार के चुनावी प्रचार में खुली आँखों से देखकर समझ रहे होंगे, कि गठबंधन सरकार के दबाव में यदि कोई घटनाएं भ्रष्टाचार की हुईं थीं