महामहिम और प्रधानमंत्री का सुझाव चुनावी जुमलों में कैसे टिकेगा? – सुधीर सिंह परिहार

एक दशक पहले भाजपा के पितृ पुरूष लालकृष्ण आडवाणी ने देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराए जाने की लगातार वकालत की थी। उस समय न तो राजनैतिक दलों ने, न सामाजिक संगठनों व मीडिया ने और न ही स्वयं चुनाव आयोग ने इस मुद्दे पर कोई बड़ी बहस को स्थान दिया था और बात ठण्डे बस्ते में चली गई थी।

अब एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके बाद महामहिम राष्ट्रपति ने एक साथ चुनावों की संभावनाओं पर सहमति की जरूरत बतायी है। देश की कार्यपालिका के संवैधानिक और वास्तविक दोनों ही प्रमुखों की सलाह इस तर्क के साथ कि इससे समय और अनावश्यक खर्च दोनों ही की बचत होगी, स्वीकार्य है, लेकिन यह सुझाव एक आदर्श कल्पना के आगे कितना व्यावहारिक होगा इसकी जांच स्वयं यह दोनों शक्तियां अपने अनुभवों की कसौटी पर भी कर सकती हैं।

पिछले लोकसभा चुनावों के समय जो वायदे स्वयं नरेंद्र मोदी जी ने किए थे और जनता को कांग्रेस के विरूद्ध खड़ा करने के लिए जिस तरह की व्यवस्था के सपने दिखाए थे, क्या वास्तव में अब भी वे उसी दिशा में अपनी सरकार को आगे बढ़ा रहे हैं? इस भाजपा सरकार का मार्गदर्शक कहे जाने वाले आरएसएस द्वारा ही जिन भगवान राम को भारतीय अस्मिता का प्रतीक बताकर मंदिर की लड़ाई खड़ी की गई थी.

क्या अब भी राम संघ के लिए और भाजपा के लिए सत्ता, सरकार और चुनाव से ज्यादा महत्व रखते हैं? 2012 के चुनावों में जिस भाजपा को उत्तरप्रदेश की जनता ने गिनती की सीटें मुश्किल से दी थीं और समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत दिया था उसी उत्तरप्रदेश में मात्र दो साल बाद हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा के अलावा जनता को और कोई पार्टी समझ ही नहीं आयी। अब यदि 2012 में ही विधानसभा और लोकसभा दोनों चुनाव एक साथ हो जाते तो क्या समाजवादी पार्टी अथवा भाजपा जनता से अलग-अलग निर्णय ले पाते?

एक समस्या हमारे संघात्मक ढांचे से भी जुड़ी है कि विधानसभा और लोकसभा क्रमश: क्षेत्रीय और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों से भटक जाते हैं। एक साथ चुनावों में यह समस्या और विकट हो सकती है। सबसे बड़ी कमी हमारे राजनीतिक ढांचे में ही है कि राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के द्वारा जनता के बीच घोषित नीतियां व चुनाव में कही गई बातें अधिकतर मामलों में सिर्फ चुनावी जुमले बन कर रह जाती हैं और जनता के हाथ पांच साल तक उनको कोसने के अलावा और कोई चारा नहीं बचता।

एक साथ लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में व्यावहारिक समस्याएं

यदि भाजपा और मोदी जी अपनी चुनावी चर्चाओं को धरातल पर उतारकर जनता को अच्छे दिनों का अनुभव करा पाते तो फिर दिल्ली में सातों लोकसभा सीटें जीतने वाली भाजपा केजरीवाल के सामने 3 सीटों पर ही घुटने क्यों टेकती? स्पष्ट है कि राजनीतिक दल जनता के बीच जो कहते हैं उसे करते नहीं हैं, अर्थात् उनकी कथनी-करनी में उत्तर-दक्षिण जैसा अंतर होता है। जो अन्ना हजारे कांग्रेस को भर-भर मु_ी कोसते थे

वे अब अपने चेले केजरीवाल के लिए दबी जुबान से समझाईश से ही काम चला रहे हैं। क्या अन्ना, जनरल व्ही.के. सिंह और किरण बेदी के भाजपा में जाने के बाद लोकपाल के विषय में कोई बात न करने से संतुष्ट हैं? क्या अन्ना को नहीं लगता कि उनके मंच का उपयोग कुछ लोगों ने अपने राजनीतिक भविष्य को चमकाने के लिए किया और जनता का भावनात्मक शोषण लोकपाल और स्वराज के नाम पर हो पाया?

यह ठीक है कि बार-बार चुनावों में धन और समय की बर्बादी होती है, लेकिन यह भी उतना ही सही है कि यदि राजनीतिक लोगों को सिर्फ एक बार बेवकूफ बनाने के प्रयासों के द्वारा कई सरकारें एक साथ बना पाने का ऑफर उपलब्ध करा दिया गया, तो देश को ज्यादा बड़ा नुकसान होने की आशंका भी खड़ी हो जाएगी। लोकसभा में पूर्ण बहुमत वाली भाजपा सरकार की राज्य सभा में बहुमत न होने की छटपटाहट और बैचेनी कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में आसानी से देखी जा सकती है, क्योंकि विपक्षी दल अब उनके चुनावी वायदों को चुनावी जुमले सिद्ध करके जनता को प्रश्रवाचक मुद्रा में खड़ा कर रहे हैं।

एक कल्पना करें कि दिल्ली और पंजाब तथा गोवा के चुनाव यदि दिल्ली विधानसभा के समय ही एक साथ हो जाते तो, क्या जनता को केजरीवाल के चरित्रवान चेहरों का असली रूप जानने के बाद फैसला देने का अवसर इतनी जल्दी उपलब्ध हो पाता? बात काले धन की हो, दस सिर लाने की हो, जनता के धन की चौकीदारी करने की बात हो या फिर अन्ना हजारे, बाबा रामदेव, श्रीश्री रविशंकर जैसे गैर-राजनीतिक व्यक्तित्वों के द्वारा अपने प्रभाव का राजनीतिक लाभ किसी पार्टी को देने के लिए जनता के वोट को प्रभावित करने का प्रयास हो, वास्तव में लोकतंत्र का वह कमजोर पक्ष है जिसे अलग-अलग समयों में परीक्षण करके ही ठीक किया जा सकता है।

एक ही अवसर पर भावनाओं को विशेष दिशा में बहकाकर किसी गैर जिम्मेदार व्यक्ति को सत्ता सौंपने का उपाए भारत जैसे न्यूनतम राजनीतिक समाजीकरण वाले देश में बहुत घातक भी हो सकता है। इस पर काम करने से पहले चुनावी बायदों को बाध्यकारी बनाकर कानूनी दायरे में लाना होगा, नहीं तो लोकतंत्र को अधिनायक तंत्र में बदल सकने वाले कई भारत में ही पैदा हुए नागरिक मौजूद हैं, जो काम करके दिखाने के बजाए सिर्फ जुबानी करतब के लाजबाव खिलाड़ी हैं।

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