“हर धर्म को समझने की कोशिश के बाद मैंने क़ुरआन पढ़ा, फिर मैं ज़िन्दगी का मक़सद समझ गया, और मैं मुस्लिम हो गया” – ‘ब्रैंडन द रेसलर’, अमेरिकन चैम्पियन रेसलर

जब मैंने क़ुरआन पढ़ा तो मुझे महसूस हुआ कि हाँ, ये धर्म में कोई अलग बात है। मैं अपने घर आया और अपनी पत्नी से कहा की अब मैं ईसाई नही रहूंगा मैं अब सच को पहचान चूका हूँ। उसने कहा ठीक है पर इसका असर हम दोनों की ज़िन्दगी पर पड़ेगा। पर उसने मेरा साथ दिया और उसने मेरा साथ इसलिए दिया होगा क्योंकि उसने मेरे चेहरे पर शान्ति देखी होगी।

अस्सलामु अलैकुम वरहमतुल्लाहि वबरकातुह, मेरा नाम माइलो चारटीयर है। मैं एक आयरिश कैथोलिक खानदान में, मैनहट्टन में पैदा हुआ था। मैं जब छोटा था तो मेरे पड़ोसी बहुत ड्रग्स एडिक्ट थे। मुझे उनके कारण मुझे ड्रग्स की लत लग गई। आयरिश माफिया मेरे पिता के साथ काम करते थे।

मैं अपनी 5 साल की उम्र से ही रेसलिंग सीख रहा था। और मैंने 20 साल तक रेसलिंग की। वह मेरी पहचान थी, वह मेरे लिए सब कुछ थी। सब मुझको ‘ब्रैंडन द रेसलर’ के नाम से जानने लगे। मैं 4 बार स्टेट रेसलिंग चैंपियन था। जब मैं एरिज़ोना विश्वविद्यालय में पढ़ रहा था तभी मैं कॉलेज की रेसलिंग टीम में भी था। जहा मुझको बहुत भयानक चोट लग गई, वह चोट मेरी पीठ पर लगी थी और मुझसे कहा गया की मैं अब और नही लड़ सकता।

मुझे याद है वो दिन जब मेरे कोच ने और मेरे ट्रेनर ने मुझे ऑफिस में बुलाया और कहा की तुम्हारी रेसलिंग खत्म। मुझे इस बात का बहुत दुःख हुआ मैं एक तरह के दर्द से गुज़रने लगा और मैं चाहता था की जो दर्द मैंने सहा है वो अगला न सहे।

मैं हर धर्म को ढूंढने लगा जो मुझे सही लगे। मैं ईसाइयत के और्थोडौ फिरके में चला गया। हालांकि मैं कैथोलिक घर में पैदा हुआ था पर मैं ऑर्थोडॉक्स भी जानना चाहता था। वहा पर मैंने सालो पढाई की और जाना की यह धर्म (ऑर्थोडॉक्स) भी सही नही है।

मैंने सोचा कि अब मैं तौरैत पढूंगा जोकि 5 किताबों में से पहली है। और मैं वहां की एक स्थानीय पूजा गृह में गया और कहा की मुझे यहूदी बनना है। वहां पर रब्बी थे, उन्होंने मुझसे पूछा की क्या तुम्हारी माँ यहूदी हैं? मैंने कहा नहीं, मेरी माँ यहूदी नही हैं।

तो उन्होंने कहा की क्या तुम किसी यहूदी से शादी करोगे? तो मैंने कहां की अगर वह मुझे अच्छी लगी तो कर लूंगा। तो उन्होंने कहा की तुम्हे हमारी मर्ज़ी से शादी करनी होगी। तो इस तरह मुझे यह धर्म भी समझ नही आया।

फिर मैं नेपाल जाकर बौद्ध और हिन्दू धर्म के बारे में पढ़ने लगा। पर मुझे इन दोनों धर्म में कुछ नही मिला।

पर जब मैंने क़ुरआन पढ़ा तो मुझे महसूस हुआ कि हाँ, ये धर्म में कोई अलग बात है। मैं अपने घर आया और अपनी पत्नी से कहा की अब मैं ईसाई नही रहूंगा मैं अब सच को पहचान चूका हूँ। उसने कहा ठीक है पर इसका असर हम दोनों की ज़िन्दगी पर पड़ेगा। पर उसने मेरा साथ दिया और उसने मेरा साथ इसलिए दिया होगा क्योंकि उसने मेरे चेहरे पर शान्ति देखी होगी।

मुझे अपना रेसलिंग भविष्य खराब होने पर बहुत गुस्सा आता था पर जब मैं इस्लाम में आया मेरा सारा गुस्सा जैसे उड़ सा गया था। मैं बहुत शांत स्वभाव का हो गया था। मेरे मुसलमान होने के एक हफ्ते बाद जब उसने मुझमे इतना बदलाव देखा तो मेरी पत्नी भी इस्लाम को मान गई और मुसलमान हो गई। और मुझे इस बात की बहुत ख़ुशी है। आज मेरी सबसे अच्छी दोस्त मेरी पत्नी ही है उसने ही मुझे सबसे अच्छे से समझ।