शहडोल में हिमाद्री नहीं हारीं बल्कि कांग्रेस से भाजपा और सीएम शिवराज सिंह जीते हैं

देश में नोटबंदी के बाद हाल ही में हुए उपचुनावों को कई लोग केंद्र सरकार के नोटबंदी के फैसले पर रायशुमारी जैसा भी मान रहे थे। परिणामों में हालांकि भाजपा को नुकसान फायदा तो नहीं हुआ, लेकिन मध्यप्रदेश में कांग्रेस की उम्मीदों पर शिवराज सिंह ने पानी अवश्य ही फेर दिया है। हालांकि उपचुनावों में सत्ता में बैठी पार्टी ही अधिकतर मामलों में जीतती है, लेकिन नेपानगर छोड़ भी दें तो कम-से-कम शहडोल लोकसभा क्षेत्र के लिए कांगे्रस के पास एक बहुत अच्छा उम्मीदवार था, जिसकी हार से कांग्रेस को निराश होना तय है।

ज्योतिरादित्य सिंधिया की मेहनत को भी कांग्रेस के अति-आत्मविश्वास ने डुबोया

शहडोल चुनाव में हिमाद्री सिंह को भाजपा द्वारा अपना प्रत्याशी बनाए जाने के प्रस्ताव की जानकारी भी स्वयं हिमाद्री द्वारा वोटिंग से कुछ दिन पहले मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को एक फिल्मी गाने के चुनावी प्रचार में उपयोग किए जाने की शिकायत करते हुए कही थी।

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इसका सीधा सा अर्थ है कि हिमाद्री दलबीर सिंह का क्षेत्र में काफी अच्छा दबदबा और साफ सुथरी छवि होने से चुनाव जीतने की संभावनाएं भाजपा भी मानकर चल रही थी। चुनाव प्रचार में कांग्रेस के कई दिग्गज भी शामिल हुए, जिसमें लोकसभा में कांग्रेस के सचेतक और सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया भी शामिल थे। भाजपा और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के हाथों कई हार झेल चुके कांग्रेसियों की फितरत इस चुनाव में भी नहीं बदली और उनका अति-आत्मविश्वास पूरे चुनाव प्रचार में दिखा।

यहां तक कि चुनाव से ठीक पहले एक हाई कमान समर्थित लेकिन जनता में ज्यादा पकड़ न रखने वाले नेता जी ने तो हम चुनाव जीत चुके हैं जैसी बातें करना शुरू कर दी हैं। हालांकि सरकारी मशीनरी और प्रभाव का दुरूपयोग करने की शिकायतें कांग्रेस की तरफ से हुईं और अनूपपुर कलेक्टर अजय शर्मा को शिवराज सरकार द्वारा हटाने के निर्णय को खारिज करते हुए चुनाव आयोग द्वारा फिर से पदस्थ करने का घटनाक्रम भी चला। भाजपा सरकार के मंत्री, विधायक और नेता सभी सक्रिय बने रहे और अंत तक अपनी कोशिशों में कोई कमी नहीं आने दी।

भाजपा के कार्यकर्ताओं का जमीनी स्तर पर पूरी ताकत से काम करना, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का चुनाव को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा मानकर पूरा नियंत्रण अपने हाथ में रखना और मंत्री भूपेंद्र सिंह द्वारा स्थानीय स्तर पर पूरे चुनाव का संगठन व प्रबंधन देखना कांग्रेस की हार का कारण बने। इसके बावजूद चुनाव से पहले जो हवा हिमाद्री सिंह के पक्ष में थी उसके बाद कांगे्रस का हार जाना कांग्रेस के लिए एक बार फिर से पूरी स्थिति को समझने और कमियां ढूंढऩे का विषय तो है ही।

एक बार फिर कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के जमीन पर किए गए प्रयासों का लाभ लेने से वंचित रह गई। सांसद सिंधिया ने अपने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं तथा आदिवासी मतदाताओं को उत्साहित करने के लिए चूल्हे पर रोटियां सेंकने, खाना परोसने और जमीन पर बैठकर कार्यकर्ताओं के साथ भोजन करने से लेकर जोरदार भाषण वाली सभाएं करने तक कई उपाए अपनाए। यह सारी मेहनत 2009 और 2013 की तरह ही बेकार चली गई और कांग्रेस की इस हार से उन समर्पित तथा नेताओं की गुटबंदी से दूर कांग्रेस की विचारधारा को मानने वाले कार्यकर्ताओं तथा हिमाद्री जैसे साफ-सुथरे लोगों को अवश्य ही निराशा से भर दिया है।

पहली बात तो कांग्रेस अभी भी जनता को भरोसा दिलाने में सक्षम नहीं लगती। दूसरे आदिवासी, अल्पसंख्यकों और अन्य वर्गों के प्रति अचानक उपजा प्रेम अब वोट दिलाने की बजाए कटाने का काम करने लगा है यह कांग्रेस को समझना होगा। तीसरी बात जमीन पर कांगे्रस की लड़ाई को अपनी लड़ाई समझने वाले कार्यकर्ता या तो शिथिल पड़ गए हैं या फिर भाजपा में चले गए हैं।

भिंड के चौधरी राकेश सिंह हों, होशंगाबाद के उदय प्रताप सिंह हों या शहडोल चुनाव में ब्राह्मण मतदाताओं को संभालने वाले कटनी के संजय पाठक हों, यह सभी कांग्रेस की गुटबंदी से परेशान होकर भाजपा में अपना भविष्य खोजने के लिए कांग्रेस छोड़ गए, तो फिर कार्यकर्ता की क्या बिसात है? यह स्थिति स्वयं ज्योतिरादित्य सिंधिया के क्षेत्र में भी देखने में आती है, लेकिन विकल्पों का अभाव कार्यकर्ताओं को मुखर नहीं होने देता।

भाजपा के द्वारा गुना-शिवपुरी क्षेत्र में सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ विरोध का कोई भी छोटा-बड़ा अवसर हाथ से न जाने देने की प्रवृत्ति को लोकसभा में मोदी लहर के बावजूद भाजपा को मिली हार का असर कह लें या फिर भविष्य में उनकी मुख्यमंत्री पद की दावेदारी की संभावना को ध्यान में रखकर अभी से दबाव बनाने की रणनीति समझ लें, लेकिन योजनाबद्ध प्रयास सांसद सिंधिया को लक्ष्य बनाकर किए जा रहे हैं इस बात को अनुभव किया जा सकता है।

चौथी बात भाजपा में चुनाव का पूरा नियंत्रण शिवराज सिंह के हाथों में था तो कांग्रेस की तरफ से वहीं पुरानी स्थिति थी कि जीत सभी की और हार दूसरों की। शिवराज सिंह का जनता से जुड़ाव अभी भी है और वह बिना लोगों के बीच जाए भी अपना प्रभाव रखते हैं और उनके कार्यकर्ता उस प्रभाव को आभाहीन होने भी नहीं देते।