“इस्लाम महिलाओ के अधिकार को छीनता नहीं बल्कि सब से पहले इस्लाम ही ने महिलाओं को अधिकार दिये है”- अमेरिकन सिस्टर लिसा वोग्ल हामिद

मेरा नाम लिसा है। मेरी उम्र 31 साल है। मैं एक ईसाई खानदान से थी। मेरे पिता कैथोलिक थे पर मेरी माँ एक रूढ़िवादी ईसाई बैप्टिस्ट थी।  तो मेरा इस्लाम में आना मेरे परिवार के लिए एक बहुत ही बड़ा मुद्दा था। मेरी माँ ने मुझे बिलकुल अपनी तरह बनाना चाहती थी और मैं उनकी तरह बनी भी। मेरी नैतिकता भी उनकी तरह थी, मेरा काम करने का तरीका भी उनकी ही तरह था, हम दोनों की सब बातें एक दुसरे से मिलती थी।

पर मैं उनकी तरह धार्मिक नही नही थी। जैसा की मैंने बताया की मेरी माँ एक रूढ़िवादी बैप्टिस्ट थी पर मुझे ईसाई धर्म ज़्यादा पसन्द था मैं जब थोड़ी बड़ी हुई तो मैं क्रिस्चियन कैंप में भी जाने लगी थी।

मुझे याद है की जब मैं 15 साल की थी। मैं मिननासोटा में एक “यंग लाइफ कैंप” में गई थी। वहां पर यह करना होता था की सबको एक साथ हो कर कहना पड़ता की ईसा ही मेरे ईश्वर हैं। मैंने भी ऐसा ही किया। उस समय मेरी उम्र 15 साल थी, तो कोई 15 साल की उम्र में खोज बीन नही करता, जो कोई भी कुछ कहता है, मानता है हम वही मान लेते हैं।

मैं खुद में यह सोचने लगी की अगर किसी को कभी बताया भी न गया हो की बाइबिल क्या है तो क्या वह नरक में जाएगा क्योंकि बाइबिल में ऐसा लिखा था की जो बाइबिल नही पढ़ेगा तो वह नरक में जाएगा। इससे मुझे ईसाइ धर्म पर शक़ होने लगा पर फिर मैं कहती नही मैं ईसा को मानती हूँ।

फिर मैं कॉलेज जाने लगी और वहां पर मुझे कई मुसलमान दोस्त मिले उनमे से कई लोग मोरक्को से थे। मैं उनके ही साथ रहती थी। एक दिन मैंने उनसे कहा की मैं तम्हारे जैसे कपडे पहनना चाहती हूँ। तो उसने कहा ठीक है और उसने मुझे अपना स्कार्फ़ दे दिया, मैंने उससे पुछा की इसको क्या कहते हैं। उसने बताया की इसको अबाया बोलते हैं।

मैं पता नही क्यों, पर 3 महीने तक रोज़ फज्र की नमाज़ में उठती थी और रोज़ अबाया और हिजाब पहनती थी। मैं ये सब मुसलमान के नाते नही बल्कि यूँही करती थी। मैं ऐसा शायद इसलिए करती थी की मैं इसको देख कर थोड़ा उत्साहित थी और मैं सोचती थी की यह एक नए तरह का कपड़ा है।

मैं उनके साथ रही पर मैं और वो ज़्यादा बात नही करती थीं,क्योंकि वह अरबी बोलती और मैं इंग्लिश। पर फिर भी मैंने थोड़ी बहुत अरबी सीख ली। फिर मैं अपने घर आ गई। पढाई पूरी हो गई थी और मैं एक बैंक में काम करने लगी। एक मुसलमान देश ‘मोरक्को’ में रहते हुए भी मुझे इस्लाम के बारे में कुछ नही पता था।

मैंने बैंक में नौकरी छोड़ दी क्योंकि मुझको ब्याज निकालना अच्छा नही लगता था। मैं हमेशा से ही फोटोग्राफर बनना चाहती थी, क्योंकि यह एक बहुत रचनात्मक काम होता है।