इस्लाम धर्म ने मानवाधिकारों को बहुत उच्च स्थान प्रदान किया है यहाँ पढ़े कैसे

निःसंदेह मानवाधिकार जहां बीसवीं सदी का सबसे महत्वपूर्ण और जटिल मुद्दा है, तो वहीं इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती है। आज विश्व में चाहे अनचाहे मानवाधिकार का विषय वार्ता का प्रमुख मुद्दा बन गया है। बहुत से कार्यों, निर्णयों और कार्यक्रमों को मानवाधिकार के मापदंडों पर रखकर परखा जाता है। मानवाधिकार के समर्थक व विरोधी अपने कामों को इसके हित में दिखाने का प्रयास करते हैं।

बीसवीं सदी का सबसे महत्वपूर्ण और जटिल मुद्दा है, तो वहीं इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती है

इसके अलावा, मानवाधिकार के मामले न केवल देशों की नीतियों पर असर डालते हैं, बल्कि विभिन्न राजनीतिक एवं न्यायिक मामलों को निर्धारित करने में भी भूमिका निभाते हैं। इसलिए मानवाधाकिरों को राष्ट्र संघ या मानवाधिकार संगठनों से जोड़कर नहीं देखा जा सकता और उनकी विफलता साबित करके मानवाधिकारों को निर्थक नहीं बताया जा सकता। हालांकि बड़ी ताक़तों ने मानवाधिकारों को उपकरण के रूप में प्रयोग किया है और अपने विचारों को थोपने का माध्यम बना लिया है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि इस बहाने से मानवाधिकारों के विषय को एक कोने में उठाकर रख दिया जाए।

मानवाधिकार एक नया विषय है, जिसे वर्तमान इसांनों ने अपने लिए खोजा है। 1948 में पारित होने वाले अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार घोषणा पत्र के अनुसार, मानवाधिकार समस्त राष्ट्रों और समुदायों की ऐसी संयुक्त आकांक्षा है, जिसका समाज के हर सदस्य को सम्मान करना चाहिए, मानवाधिकार मानवीय परिवारों के सदस्यों की व्यक्तिगत हैसियत और समान अधिकार हैं, जिसका आधार न्याय और वैश्विक शांति है। वास्तव में मानवाधिकार ऐसा बुनियादी और प्राथमिक हक़ है, जो हर इंसान को केवल इंसान होने के आधार पर हासिल होता है।

इंसान का सामना हमेशा, न्याय और अन्याय, समानता और पक्षपात, आज़ादी और अत्याचार, युद्ध और शांति जैसे विरोधाभासी विषयों से होता है। इस संदर्भ मे बड़ी से बड़ी चुनौतियों का सामना करने के बावजूद, वह अभी आदर्श स्थिति तक नहीं पहुंचा है।

यूरोप में हालिया कुछ सदियों में विचार, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक क्षेत्रों में आश्चर्यजनक परिवर्तन हुए हैं, जो ईसाई जगत में रीनैसंस या नवजागरण के कारण अस्तित्व में आए हैं। आधुनिकतावाद का ध्रुव ह्यूमैनिज़्म या मानवतावाद है और बुद्धि, बुनियाद, निर्णय, वर्चस्ववाद और स्वाधीनता की इच्छा मानवतावाद के तंत्र हैं।

मानवतावाद और नए समाज के परिवर्तनों के परिप्रेक्ष्य में, इंसान को अभूतपूर्व स्थान प्राप्त हुआ है। यही कारण है कि इंसान को पहले से कहीं अधिक अधिकार प्राप्त हुए हैं। विशेष रूप से पश्चिमी लोगों की दिन प्रतिदिन बढ़ती ताक़त और उनकी अभूतपूर्व आर्थिक एवं सैन्य शक्ति के कारण, भीषण युद्ध भड़के हैं, जिनमें से पहला विश्व युद्ध और दूसरा विश्व युद्ध शामिल हैं।

इन युद्धों, विस्तृत पैमाने पर अन्याय और भेदभाव के कारण इंसान की आज़ादी और सम्मान को पुनर्जीवित करने के भी प्रयास हुए हैं। उसके बाद से बीसवीं सदी तक लम्बा समय बीत गया और यूरोप के लोग कड़वे अनुभवों से इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मानवाधिकार, शांति, न्याय और सुरक्षा के लिए नए सिरे से प्रयास किए जाने चाहिएं।

इस प्रकार, 1948 में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार घोषणा पत्र पारित हुआ। यह घोषणा पत्र पश्चिमी राष्ट्रों के अतीत के अनुभवों का परिणाम है। यह एक ऐतिहासिक प्रक्रिया के तहत विश्व स्तर पर वजूद में आया है, जिसे पिछले पचास वर्षों में समस्त सरकारों ने स्वीकार किया है। 30 अनुच्छेदों पर आधारित इस घोषणा पत्र के सिद्धांतों और प्रस्तावना से इसके वजूद में आने के कारण, स्पष्ट हो जाते हैं।

घोषणा पत्र की प्रस्तावना का अर्थ समझने के लिए हम उसके कुछ अंशों का यहां उल्लेख कर रहे हैं। मानवीय परिवार के समस्त सदस्यों की व्यक्तिगत स्थिति और उनके समान अधिकारों की पहचान, आज़ादी, न्याय और विश्व में शांति का आधार बनती है, मानवीय अधिकारों की पहचान न करने और उनके अपमान से ऐसे अत्याचार हुए हैं कि मानवीय आत्मा कांप उठी है।

ऐसे विश्व का उदय कि जिसमें लोगों को अभिव्यक्ति की आज़ादी प्राप्त हो और कोई भय न हो और ग़रीबी न हो, मानवता की सबसे महत्वपूर्ण महत्वकांक्षा है। क़ानूनों को लागू करके मानवाधिकारों का समर्थन किया जाना चाहिए, ताकि इंसान अत्याचार और दबाव के अंतिम उपचार अर्थात अत्याचार के ख़िलाफ़ आंदलोन का सहारा लेने के लिए मजूबर न हो। विभिन्न राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों में विस्तार के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र के लोग मूल मानवाधिकारों और इंसानों के मूल्यों एवं महिलाओं और पुरुषों के समान अधिकारों के प्रति कटिबद्ध हैं, जैसा कि उन्होंने घोषणा पत्र में इस पर विश्वास जताया है कि वे सामाजिक विकास में सहयोग करेंगे और आज़ाद माहौल में जीवन की स्थिति को बेहतर बनायेंगे। सरकारों ने प्रतिबद्धता जताई है कि वे राष्ट्र संघ के साथ सहोयग से मानवाधिकारों और मूल आज़ादी का वास्तविक रूप में सम्मान करेंगी।

इन अधिकारों और आज़ादी के प्रति संयुक्त समझ का इनके पालन में अत्याधिक महत्व है। राष्ट्र संघ की महासभ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार घोषणा पत्र को समस्त लोगों और राष्ट्रों के लिए संयुक्त आकांक्षा क़रार देती है, ताकि सभी लोग और समस्त सदस्य इस घोषणा पत्र को मद्देनज़र रखें और इसके लिए प्रयास करें, ताकि शिक्षा व प्रशिक्षा द्वारा इन अधिकारों का सम्मान किया जाए और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोच विचार करके इन्हें पहचाना जाए और हर स्तर पर उनका पालन किया जाए।

आज मानवाधिकार के रूप में जो कुछ पेश किया जाता है, वह ऐसे सिद्धांत और नियम हैं, जिनका आधार मानवाधिकार घोषणा पत्र और पश्चिमी विचारकों के विचार हैं। इन वाचिरकों का मानना है कि मानवाधिकारों का धर्म से कोई लेना देना नहीं है, बल्कि इनका आधार मानवीय विचार हैं। वे धर्म से अलग स्वाधीन रूप से इनकी समीक्षा करते हैं। अगर उसमें कोई विरोधाभास पाया जाता है तो ज्ञान के सिद्धांतों के आधार पर उसका समाधान निकालते हैं और धार्मिक सिद्धांतों से कोई सहायता नहीं लेते हैं।

हालांकि इतिहास में मानवाधिकारों के विषय की चर्चा का एक बड़ा हिस्सा ईश्वरीय धर्मों से संबंधित था। इसलिए कि ईश्वरीय धर्मों ने हमेशा अत्याचारियों और मानवाधिकारों के उल्लंघनकर्ताओं का मुक़ाबला किया है। इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं है कि मानवीय उच्च मूल्यों जैसे कि सम्मान, मानवीय व्यक्तित्व, आज़ादी और समानता आदि की जड़ें ईश्वरीय दूतों की शिक्षा में हैं और ईश्वरीय धर्म मानवाधिकारों के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं।

ईश्वरीय धर्म के रूप में इस्लाम ने मानव और मानवाधिकारों को बहुत उच्च स्थान प्रदान किया है। इसलिए बहुत से विचारकों का मानना है कि बुनियादी रूप से मानवाधिकारों को ईश्वरीय स्रोतों से अलग नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि कुछ इस्लामी विद्वान और विचारक मोटे तौर पर इस्लाम के अनुसार, आज़ादी और अधिकार जैसे विषयों को पश्चिमी मानवाधिकारों से अलग बताते हैं।

उनकी दृष्टि में अधिकारों के आधार का निर्धारण और उसकी परिभाषा लोगों की विचारधारा और इंसान के बारे में उनके विचारों से संबंधित है। इस्लामी विद्वानों का मानना है कि ईश्वर समस्त सृष्टि का रचनाकार है और हर चीज़ उसका जलवा है। इस प्रकार, ईश्वर से हटकर वे इंसान के लिए किसी भी अधिकार को स्वीकार नहीं करते हैं। जीवन का अंतिम उद्देश्य ईश्वर से निकटता प्राप्त करना है और इंसान अपनी बुद्धि एवं अन्य क्षमताओं का प्रयोग करके वहां तक पहुंचने का रास्ता खोजता है। इसलिए इंसान का कोई अधिकार नहीं है, लेकिन यह कि ईश्वर की इच्छा के अनुसार, अस्तित्व में आया हो। उनके अनुसार, इंसान केवल ख़ुद मानवाधिकारों के निर्धारण के व्यापक एवं संयुक्त स्रोत को प्राप्त नहीं कर सकता।

इसके अलावा, समस्त इंसानों में संयुक्त बिंदु, ईश्वरीय सृष्टि है। इस प्रकार, इसी ईश्वरीय सृष्टि को आधार बनाकर, मानवाधिकारों का मूल स्रोत प्राप्त किया जा सकता है।

इसी तरह से क़ानून बनाने और अधिकारों के निर्धारण के लिए विश्व की पूर्ण पहचान ज़रूरी है। इंसानों को अपनी और अपने समाज की बहुत सीमित जानकारी है और जो कुछ जानकारी है उसमें भी व्यक्तिगत भावनाएं शामिल हो जाती हैं।

इसलिए यह जानकारी केवल ईश्वर के पास है और इसे प्राप्त करना इंसान के लिए संभव नहीं है। अतः केवल ईश्वर को अधिकारों के निर्धारण का अधिकार है और इसी कारण, ईश्वरीय क़ानूनों की ग़ैर ईश्वरीय क़ानूनों पर वरीयता प्राप्त है। केवल धार्मिक स्रोतों द्वारा ही मानवाधिकारों का निर्धारण किया जा सकता है।

मोटे तौर पर इस दृष्टिकोण में इस्लामी विचारों और मानवाधिकारों के वर्तमान स्वरूप में बुनियाद अंतर है। हालांकि इस विचारधारा के मुताबिक़, मानवाधिकार घोषणा पत्र में बयान किए गए कुछ विषय सही हैं। इसलिए कि यह दोनों व्यवस्थाएं मूल रूप से एक दूसरे की विरोधाभासी नहीं हैं। इसलिए कि इंसान का अपने प्राकृतिक अधिकारों से अवगत होना ही मानवाधिकारों के जन्म लेने का कारण बनता है। ईश्वरीय धर्म का आधार भी मानवीय प्रकृति ही है। अधिकार, आज़ादी और समानता जैसे विषयों की ईश्वरीय धर्म की परिभाषा प्रचलित परिभाषा से भिन्न है।

1948 में मानवाधिकार घोषणा पत्र के संकलन की दास्तान लम्बी है, लेकिन संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि इस घोषणा पत्र को समझना मानव के दुख भरे इतिहास और इतिहास में सुधारवादियों के प्रयासों पर ध्यान दिए बिना संभव नहीं है। साभार: तीसरी जंग न्यूज़

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