इस तेज-तर्रार युवा सांसद ने अब खुलकर कमजोर कांग्रेस की लड़ाई का नेतृत्व करने का सुदृढ़ निश्चय कर लिया है

लोकसभा में प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा न मिलने के बावजूद भी कांग्रेस यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और एनडीए सरकार पर बहुत अधिक दबाव बनाने में सफल हुई है तो उसमें एक बड़ा योगदान कांग्रेस के तेज-तर्रार युवा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया का आक्रमक लेकिन बेहद तार्किक व तथ्यों पर आधारित बोलने का अंदाज भी देखा जा रहा है.

अब भाजपा के सामने है एक बड़ी चुनोती, कांग्रेस के तेज-तर्रार युवा सांसद ‘ज्योतिरादित्य सिंधिया’

कांग्रेस को लोकसभा में मिली गिनती की सीटों में अपनी गुना-शिवपुरी सीट मोदी लहर के बावजूद एक लाख मतों से अधिक की जीत के साथ देने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस की ‘कोर-लीडरशिपÓ का हिस्सा बन गए हैं। पिछले डेढ़ वर्षों में जितने भी प्रमुख मुद्दे रहे हैं उन पर कांग्रेस का पक्ष रखने की प्रमुख जिम्मेदारी पार्टी ने अपने बेदाग छवि और जनता में गहरी जड़ें रखने वाले सिंधिया को ही सौंपी है।

पिछले मौकों पर लोकसभा की कार्यवाहियों में आए विभिन्न नेताओं के वक्तव्यों का तुलनात्मक अध्ययन करें तो सदन में चीखते, शोर मचाते अथवा अतार्किक दबाव बनाते भाषणों में सिंधिया एक अलग ही आकर्षण पैदा करते दिखते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि उनके भाषण देते समय विपक्षी नेता भी बीच में बोलने से कतराते हैं और वो शायद इसलिए कि सिंधिया अपने विषय पर पूरी तैयारी से और पूरे तथ्यों के साथ होते हैं।

उनकी संवाद करने की क्षमता काफी त्वरित और तात्कालिक बौद्धिक क्षमता से लबालब दिखती है। ताजा मानसून सत्र के तीसरे दिन ही कश्मीर मुद्दे पर ‘प्लीबिसाइटÓ अर्थात् ‘जनमत संग्रहÓ या ‘रायशुमारीÓ जैसे शब्द के उर्दू अनुवाद में गफलत के कारण ज्योतिरादित्य सिंधिया को भाजपा ने निशाने पर लेने की कोशिश भी की, लेकिन यह सांसद सिंधिया की ‘कथनी और करनीÓ में एकता वाली पारदर्शी छवि का ही असर था कि उनको घेरने की कोशिशें बेअसर ही साबित हुईं।

पठानकोठ हमले के बाद सरकार और गृह मंत्रालय की पूरी स्थिति से निपटने की रणनीति पर कांग्रेसी सांसद सिंधिया का तीखा हमला झेलने में सरकार को कई तर्क देने की जरूरत पड़ गई। दो दिन पहले ही दलित अत्याचारों के मुद्दे पर जिस तरह से सिंधिया ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरा और उनके दलित प्रेम पर सवाल-पर-सवाल खड़े कर दिए, उसने एक बात तो साफ कर दी है कि भले ही कांग्रेस हाईकमान मध्यप्रदेश का नेतृत्व ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंपने की घोषणा में देर कर रही हो, परंतु इस कांग्रेसी सांसद ने शायद अब खुलकर कमजोर कांग्रेस की लड़ाई का नेतृत्व करने का सुदृढ़ निश्चय कर ही लिया है।

उनका यह निर्णय तार्किक और कांग्रेस के हित में मानने वालों का एक बड़ा वर्ग इसलिए भी तैयार हो गया है क्योंकि बुरे दौर से गुजर रही कांग्रेस में अभी दूसरे नेता बहुत कुछ करने की स्थिति में हैं भी नहीं, उनका जनता के बीच आधार और जुड़ाव सीमित ही साबित हुए हैं। मध्यप्रदेश में भी अब भाजपा की रणनीति में ज्योतिरादित्य सिंधिया केंद्र में आ गए हैं

और भाजपा में हुए ताजे बदलाव इसी ओर इशारा करते हैं कि भाजपा को भी यह लगने लगा है कि उन्हें प्रमुख खतरा कांग्रेस के इसी साफ-सुथरी छवि वाले नेता से होने की आशंका ज्यादा हो सकती है। हाल ही के ईसागढ़ जैसी छोटी नगरपालिका के चुनाव में इसे देखा भी गया है।

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