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सिमी कार्यकर्ताओं की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से बढ़ा सस्पेंस, कुछ सवालों के जवाब अभी भी सस्पेंस में है

भोपाल। पुलिस द्वारा एनकाउंटर में मारे गए 8 सिमी कार्यकर्ताओं की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आ गई है। भोपाल के हमीदिया अस्पताल से आई पीएम रिपोर्ट ने एनकाउंटर की प्रमाणिकता और पुलिस के इरादों पर एक बार फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं। इस रिपोर्ट में आठों कार्यकर्ताओं को ज़्यादातर गोलियां कमर से ऊपर सीने और सिर पर लगी हैं। रिपोर्ट ने एनकाउंटर की प्रमाणिकता अब और सवाल पैदा कर दिए हैं।

दरअसल घटना के बाद आए वीडियो में साफ दिखाई दे रहा है कि पहाड़ियों पर खड़े लोग पुलिस से बात करने की कोशिश कर रहे हैं (यह बात पुलिस की वॉकी-टॉकी पर साफ सुनाई दे रही है) उन्होंने अपने हाथ भी समर्पण की मुद्रा में खड़े किए हुए हैं पर इसके बावजूद पुलिस वालों ने आत्मरक्षा के नाम पर उनके सीने और सर में गोलियां मार दीं यह भी साफ दिखई दे रहा है की उन के हाथ में कोई भी हथियार नहीं है

सुप्रीम कोर्ट के गाइडलाइन के अनुसार अपराधियों द्वारा सामने से चलाई जा रही गोलियों की स्थिती में ही पुलिस को उनका एनकाउंटर करने की इजाज़त होती है जबकि सिमी के सदस्यो की तरफ से कोई फायरिंग नहीं हो रही थी वहीं एक दूसरे वीडियो में एक पुलिसवाला एक सिमी कार्यकर्ता के शव पर गोली चला रहा है।

जबकि पुलिस को कोसिस करके कम से कम एक आतंकियों को जिन्दा पकड़ न था या उनके पैरों में गोली मारी जाए ताकि उसके ज़रिए तमाम महत्वपूर्ण जानकारियाँ हासिल हो सके। लेकिन पुलिस ने उन्हें पकड़ने के बजाय उनके सीने में गोलियां मार दीं। यह एक तरह से मानवाधिकार का उलंघन तो है ही साथ में एक इशारा भी है जो बताता है कि प्रशासनिक अधिकारियों ने न्यायपालिका की भूमिका को योजनाबद्ध ढंग से ख़त्म करने के सिलसिले की शुरुआत कर दी है।

इस मामले में पुलिस आईजी का कहना है कि मुठभेड़ में तीन पुलिसवाले घायल हुए हैं लेकिन उन्हें गोली लगने के घाव नहीं बल्की किसी धारदार चीज़ के हैं तो फिर एक बड़ा सवाल उठता है कि आखिर ऐसे कौन सी स्थिती आ गई थी जो उन्हें काबू में करने के लिए गोलिया उनके सीने और सर में दागनी पड़ी। क्या पैरों में गोली मारने से वो काबू में नहीं आ सकते थे।

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